Thursday, January 31, 2019

ठाकरे के बाद जॉर्ज फर्नांडिस पर फिल्म बनाएंगे संजय राउत, शूजित सरकार कर सकते हैं निर्देशन

राजनेता से फिल्म निर्माता बने संजय राउत, नवाजुद्दीन सिद्दीकी स्टारर "ठाकरे" की सक्सेस से काफी खुश हैं. ठाकरे के बाद वे रुकने वाले नहीं हैं. खबरे आ रही हैं कि उनके प्रोडक्शन में एक और राजनीतिक बायोपिक का निर्माण किया जाएगा. शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे के जीवन पर बनी फिल्म के बाद उनका अगला प्रोजेक्ट दिग्गज समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस हैं. ख़बरों की मानें तो पूर्व रक्षा मंत्री और एनडीए के संयोजक रहे जॉर्ज फर्नांडिस के जीवन पर फिल्म के निर्माण की तैयारियां कर ली गई हैं.

मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, मार्च तक जॉर्ज के जीवन पर बन रही फिल्म फ्लोर पर चली जाएगी. ये एक बायोपिक फिल्म ही होगी. समाजवादी नेता फर्नांडिस, शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे के काफी करीब थे. फिल्म में दोनों की दोस्ती को दिखाने की तैयारी है. ठाकरे में भी एक जगह दोनों को साथ दिखाया गया है. जॉर्ज पर बन रही फिल्म के लिए राउत, मुख्य किरदार और दूसरे सपोर्टिंग किरदारों के लिए बातचीत भी कर रहे हैं.

ठाकरे की तरह यह फिल्म भी दो भाषाओं यानी हिंदी और मराठी में बनाई जा सकती है. चर्चा यह भी है कि पीकू और अक्टूबर जैसी फिल्म का निर्देशन करने वाले शूजित सरकार से निर्देशन करवाने की तैयारी है. हालांकि अभी आधिकारिक रूप से कुछ तय नहीं किया गया है. राउत ने मुंबई मिरर से कहा भी कि इस प्रोजेक्ट के लिए उन्हें शूजित जैसे अनुभवी और दक्ष निर्देशक की जरूरत पड़ेगी. पर राउत ने यह भी बताया कि अभी किसी का नाम तय नहीं किया गया है. शुरुआती रिपोर्ट्स मुताबिक़ फिल्म की कहानी 1950 के मध्य से लेकर 1975 तक मुंबई में फर्नांडिस के जीवन पर फोकस होगी. आपातकाल के दौरान जॉर्ज की भूमिका को दिखाने की योजना है. बता दें कि आपातकाल में जॉर्ज एक बड़े और लोकप्रिय विपक्षी नेता के तौर पर उभरे थे.

अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में पूर्व रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत एक ट्रेड यूनियन नेता के तौर पर ही की थी. उन्हें सरकारी कार्यालयों में मराठी को राजकीय भाषा बनाने में योगदान देने के लिए भी जाना जाता है. मुंबई की राजनीति में जॉर्ज की दखल काफी मजबूत थी. उन्होंने अपने जीवन का एक लंबा वक्त मुंबई में बिताया था. 

ठाकरे की सफलता के बाद शिवसेना सांसद राउत काफी उत्साहित दिख रहे हैं. ठाकरे में नवाजुद्दीन के अलावा अमृता राव प्रमुखता से नजर आई थीं. अभिजीत पानसे ने इसका निर्देशन किया था.

लेकिन जब आयोग और पुलिस ने वहां जाकर लड़की से बात की तो पूरा मामला खुल गया. पुलिस को पता चला कि वहां उनके अलावा भी तीन जोड़े और बंधक बनाए गए थे. चारों युगलों को पुलिस ने वहां से मुक्त कराया और आरोपी संजोए को गिरफ्तार कर लिया. उसके साथ हर्ष मल्होत्रा, सोनू, राजेश और गोविंदा नामक कर्मचारी भी आरोपी बनाए गए हैं. मुक्त कराए गए चारों जोड़ों को पुलिस ने अपने सरंक्षण में सुरक्षित स्थान पर भेजा है. अब पूरे मामले की छानबीन की जा रही है.

वहां से मुक्त कराए गए जोड़ों ने खुलासा किया कि आए दिन उनके साथ मारपीट की जाती थी. उन्हें बासी खाना दिया जाता था. संजोय और उसका स्टाफ उन लोगों से अपने हाथ-पांव दबवाता था. यहां तक कि उनसे मालिश भी कराई जाती थी. सबसे बड़ी हैरान की बात है कि उस शेल्टर होम में कोई महिला कर्मचारी नहीं है. शेल्टर होम में केवल दो कमरे हैं. जिसमें से लड़कियों के कमरे का एक दरवाजा संजोए के ऑफिस में खुलता था.

पीड़िता ने बताया कि उनके पति से सारा काम कराया जाता था. थक जाने पर उनके साथ गाली-गलौच भी की जाती थी. मारपीट आम बात थी. विरोध करने पर उनके ऊपर कुत्ते छोड़ दिए जाते थे. शाम होते ही संजोए और उसका स्टाफ शराब पीता था. वहा रहने वाले जोड़ों को भी शराब पीने के लिए विवश किया जाता था. पुलिस अब पूरे मामले की तफ्तीश में जुट गई है. इस मामले में आगे और भी खुलासे हो सकते हैं.

Tuesday, January 22, 2019

कुंभ 2019: 4200 करोड़ के बजट को सही ठहराने के लिए संख्या बढ़ाकर बताई जा रही है?

प्रयागराज में चल रहे कुंभ मेले में दो मुख्य स्नान हो चुके हैं और प्रशासन का दावा है कि इन दोनों स्नान पर्वों पर अलग-अलग दिन तीन करोड़ से ज़्यादा लोग संगम में डुबकी लगा चुके हैं.

लेकिन मेला क्षेत्र और प्रयागराज शहर में भीड़ की स्थिति, स्टेशनों पर भीड़ का दबाव और सड़कों पर छाए सन्नाटे को देखते हुए इन आंकड़ों पर सवाल उठ रहे हैं.

कुंभ के पहले शाही स्नान यानी मकर संक्रांति के दिन शाम को मेला अधिकारियों की प्रेसवार्ता में स्नान करने आए श्रद्धालुओं की संख्या का जब ज़िक्र हुआ तो प्रेस कांफ्रेंस का माहौल कुछ ऐसा हो गया कि हँसी-ठहाके लगने लगे.

पत्रकारों ने व्यंग्यात्मक लहजे में सवाल किया कि "अब आंकड़ों को अंतिम माना जाए या अभी और गुंज़ाइश है बढ़ने की."

पत्रकारों के सवालों में व्यंग्य ज़रूर था लेकिन आंकड़े जारी कर रहे अधिकारियों में बेचैनी के बावजूद आत्मविश्वास बना था. उस दिन यानी मकर संक्रांति को अनुमान था कि एक करोड़ की भीड़ आएगी.

प्रशासन ने पहले इसे एक करोड़ चौरासी लाख बताया और देर शाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस संख्या को दो करोड़ के ऊपर पहुंचा दिया. वहीं 21 जनवरी को पूर्णिमा के दिन भी आंकड़े एक करोड़ से ज़्यादा बताए गए.

मेला अधिकारी दिलीप कुमार बताते हैं, "हमारे यहां विभिन्न घाटों पर हर घंटे जो लोग स्नान करते हैं उसके आधार पर आकलन किया जाता है. इसमें फ़ोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी की मदद भी ली जाती है."

वो कहते हैं. "साथ ही रेलवे स्टेशनों, बस स्टेशनों, निजी वाहनों, इत्यादि से आने वालों का भी पता लगाया जाता है. लेकिन ये सब अनुमान ही होता है, अभी कोई डिजिटल मैपिंग जैसा सिस्टम नहीं है जिससे कि इस तरह का आंकड़ा बताया जाए."

प्रयागराज में इस बार हो रहे अर्धकुंभ को सरकार ने कुंभ का नाम दे दिया और इसे भव्यता देते हुए दिव्य कुंभ के रूप में जमकर प्रचारित किया.

कुंभ के लिए 4200 करोड़ रुपये का बड़ा बजट आवंटित किया गया और कुंभ में व्यवस्था को भी हर स्तर पर बेहतरीन बनाने की कोशिश की गई. पहली बार ऐसा हुआ कि राज्य के वरिष्ठ मंत्री देश भर में कुंभ का निमंत्रण पत्र लेकर लोगों के बीच गए हैं.

सरकार को उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में लोग आएंगे लेकिन स्थिति ये है कि मेले में आए श्रद्धालुओं की प्रशासन द्वारा बताई गई संख्या पर लोगों को भरोसा नहीं हो रहा है.

प्रयागराज में वरिष्ठ पत्रकार अचिंत्य मिश्र वर्षों से कुंभ मेला कवर कर रहे हैं. उनका कहना है कि दावे चाहे जो हों लेकिन भीड़ की गणना का कोई भी वैज्ञानिक तरीक़ा नहीं अपनाया गया है.

अचिंत्य मिश्र कहते हैं, "प्रशासन जो भी आंकड़ा दे रहा है वो सिर्फ़ अनुमान है और अनुमान भी फ़र्जी हैं. इनके पास न तो इतने घाट हैं जहां पर इतने लोग स्नान कर सकें. सड़कें शहर की पूरी की पूरी ख़ाली हैं, बसें ख़ाली आ रही हैं, ट्रेनें ख़ाली आ रही हैं और भीड़ इनकी बढ़ती जा रही है."

"पूर्णिमा को इनका अनुमान पचपन लाख का था और नहाने वालों की संख्या बता दी गई एक करोड़ से ऊपर. दरअसल, संख्या बड़ी दिखाकर ये लोग सिर्फ़ बजट को तर्कसंगत ठहराना चाहते हैं और कुछ नहीं."

राज्य के सूचना और जनसंपर्क निदेशक शिशिर सिंह कहते हैं कि पूर्णिमा के दिन प्रशासन ने तो सिर्फ़ एक करोड़ सात लाख की ही भीड़ बताया, आम लोग कह रहे थे कि ये उससे भी ज़्यादा थी. शिशिर सिंह कहते हैं, अमावास्या यानी चार मार्च को तो ये आंकड़ा चार-पांच करोड़ की संख्या को पार कर जाएगा."

जानकारों के मुताबिक़ पिछले कुंभ में पहली बार सांख्यिकीय विधि से भीड़ का अनुमान लगाया गया था और उसके मुताबिक़ यदि सभी 35 घाटों पर लगातार 18 घंटे स्नान कर रहे लोगों की संख्या जोड़ी जाए तो ये प्रशासन के दावे से क़रीब एक तिहाई भी बहुत मुश्किल से बैठती है.

इस विधि के अनुसार, एक व्यक्ति को स्नान करने के लिए क़रीब 0.25 मीटर की जगह चाहिए और उसे नहाने में लगभग 15 मिनट का समय लगेगा. इस गणना के मुताबिक़ एक घंटे में अधिकतम 12 हज़ार 500 लोग स्नान कर सकते हैं.

भीड़ की गणना के लिए मेले में आने वाले यात्रियों के रास्तों, साधनों और अन्य चीज़ों को भी आधार बनाया जाता है.

पत्रकार अचिंत्य मिश्र कहते हैं कि भीड़ के सरकारी दावों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, "इसी सांख्यिकीय गणना के आधार पर पिछले कुंभ में भी कुछ विशेषज्ञों ने सवाल उठाया था कि जब इतनी जगह ही नहीं है और संसाधन ही नहीं हैं तो लोग नहा कैसे रहे हैं."

"इस आपत्ति के कारण ही प्रशासन ने कुंभ का क्षेत्र और घाटों की संख्या बढ़ा दी. कोई भीड़ नहीं है और सारे लोग आकर संगम पर ही नहा रहे हैं."

प्रयाराज के ही रहने वाले एक श्रद्धालु ने हमें बताया कि कुंभ में मकर संक्रांति जैसे महत्वपूर्ण पर्व के बराबर तो हर साल लगने वाले माघ मेले में भीड़ दिख जाती है. उन्होंने ये आरोप भी लगाया कि भीड़ न होने के बावजूद पर्व के दिन लोगों को अनावश्यक कई किलोमीटर पैदल चलने पर विवश किया गया.

Thursday, January 10, 2019

जिस गुमनाम चिट्ठी से फंसा राम रहीम, छत्रपति ने छापी थी, फिर हो गया मर्डर

दिल्ली में 15 साल तक लगातार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित (Sheila Dikshit) के हाथों में एक बार फिर प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई है. शीला दीक्षित को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के पीछे कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. शीला में एक साथ कई खूबियां हैं, वे पंजाबी हैं और पूर्वांचली भी हैं. इसके साथ महिला और ब्राह्मण तो हैं ही. इतना ही नहीं आज भी दिल्ली में कांग्रेस के बाकी नेताओं में उनकी स्वीकार्यकता रेप केस में जेल में बंद राम रहीम पर शुक्रवार को पत्रकार राम चंद्र छत्रपति हत्याकांड मामले में विशेष सीबीआई कोर्ट में फैसला आएगा. इस मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम आरोपी हैं. इसके चलते पंचकूला में हाई अलर्ट है. यहां धारा 144 लगाई गई है. पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए हैं.

गौरतलब है कि पत्रकार राम चंद्र छत्रपति वही पत्रकार थे, जिन्होंने राम रहीम का सच पूरी दुनिया के सामने सबसे पहले लाया था. उन्होंने सिरसा में हुए दो साध्वियों के साथ हुए रेप की खबर को अपने अखबार 'पूरा सच' में छापा था. इस खबर के प्रकाशित होने के बाद राम रहीम के लोग पत्रकार राम चंद्र छत्रपति को आए दिन धमकियां देते थे. इसके बावजूद पत्रकार राम चंद्र छत्रपति निर्भीक होकर राम रहीम के खिलाफ लिखते रहे.

इसके बाद अक्टूबर 24, 2002 को पत्रकार छत्रपति पर घर के बाहर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला किया. उनकी गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई. पिता की हत्या के बाद उनका बेटा अंशुल न्याय के लिए जगह-जगह भटकता रहा, लेकिन आखिरकार आज इस मामले में कोर्ट फैसला सुनाने जा रहा है.

आपको बता दें कि राम रहीम द्वारा साध्वी से रेप की घटना कई दिनों तक दबी रही. इस पूरी घटना का खुलासा जिस गुमनाम चिट्ठी से हुआ वो पत्रकार छत्रपति ने अपने अखबार में प्रकाशित की थी. उस वक्त यह चिट्ठी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, चीफ जस्टिस पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट, समेत कई संस्थानों में भेजी थी.

तीन पेज की चिट्ठी हाथ आने के बाद पत्रकार छत्रपति ने राम रहीम के बारे में अपने अखबार में छापा था. इसके कुछ दिन बाद ही पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस चिट्ठी का संज्ञान लेते हुए सिरसा के डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज को इसकी जांच कराने का आदेश दिया. जिसके बाद जज ने यह जांच सीबीआई को सौंपी.

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चिट्ठी पर संज्ञान लेने के बाद दिसंबर 12, 2002 को सीबीआई की चंडीगढ़ यूनिट ने इस मामले में धारा 376, 506 और 509 के तहत मामला दर्ज करते हुए इन्वेस्टीगेशन की. फिर इस मामले में राम रहीम को जेल भी हुई.

कांग्रेस को दिल्ली में शीला दीक्षित से उम्मीद है. आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट में सेंधमारी कर रखी है. खासकर दलित वोट पर आप का कब्जा है. मुस्लिम वोट कांग्रेस के साथ तभी आएगा, जब उसे लगेगा कि कांग्रेस बीजेपी को हरा सकती है. वैश्य और पंजाबी वोट ज्यादातर बीजेपी के पास है. ऐसे में शीला दीक्षित के सामने दो चुनौती है. एक तो सामाजिक समीकरण को सही करना, पुराने वोट को वापस लाना के चुनौती है.

उम्र बन रही बाधा

शीला दीक्षित के विरोध में सबसे बड़ी बाधा उनकी उम्र ही रही है. शीला इस समय 80 साल की हैं. इसके अलावा उनका स्वास्थ्य भी बेहतर नहीं रहा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने उन्हें अपनी पार्टी का सीएम उम्मीदवार बनाया था. हालांकि बाद में एसपी के साथ गठबंधन होने के बाद उन्होंने दावेदारी वापस ले ली थी, लेकिन तब भी उनका स्वास्थ्य उनके प्रचार में बाधक बनकर सामने आया था. ऐसे में वो प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर कितना संघर्ष करेंगी ये अहम सवाल है. हालांकि पार्टी ने तीन कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर एक अलग रणनीति अपनाई है.

Friday, January 4, 2019

छत्तीसगढ़: बघेल कराना चाहते थे कल्लूरी को बर्ख़ास्त फिर क्यों दी अहम ज़िम्मेदारी?

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने आईपीएस अधिकारी शिवराम प्रसाद कल्लूरी को एंटी करप्शन ब्यूरो और इकनॉमिक ऑफ़ेंस विंग जैसे अहम विभाग का आईजी नियुक्त किया है.

शिवराम प्रसाद कल्लूरी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क़रीबी माने जाते हैं और कांग्रेस पार्टी उन्हें बर्खास्त करने की मांग करती रही थी.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी विपक्ष में रहते हुए कल्लूरी के ख़िलाफ़ लगातार लड़ाई लड़ते रहे थे. कई अवसरों पर उन्होंने कल्लूरी को जेल में डालने की मांग भी उठाई थी.

लेकिन अब उन्हीं शिवराम प्रसाद कल्लूरी की इस महत्वपूर्ण पद पर पोस्टिंग को लेकर राजनीतिक और मानवाधिकार संगठन चकित हैं.

राज्य के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने पत्रकारों से कहा है कि ये पदस्थापना मुख्यमंत्री कार्यालय से की गई है. दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी ने स्वीकार किया है कि कल्लूरी के ख़िलाफ़ गंभीर शिकायतें रही हैं.

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शैलेश नितिन त्रिवेदी ने बीबीसी से कहा, "बस्तर में रहते हुए एसआरपी कल्लूरी के ख़िलाफ़ कई गंभीर शिकायतें आईं और विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस पार्टी ने उन मामलों को उजागर भी किया. कांग्रेस के उठाए गए मामलों के कारण ही बस्तर में सरकारी आतंकवाद पर अंकुश लग सका. रोक लग सकी."

शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा कि शिवराम प्रसाद कल्लूरी पुलिस अधिकारी के तौर पर सेवारत हैं. इसलिए स्वाभाविक रूप से दूसरे अधिकारियों की तरह बिना किसी भेदभाव के उन्हें भी नई ज़िम्मेदारी दी गई है.

त्रिवेदी ने कहा कि कल्लूरी को कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी नहीं दी गई है और बस्तर से या माओवाद के नियंत्रण से दूर रखकर उन्हें इकनॉमिक ऑफेंस विंग जैसी संस्था में तैनात किया गया है, जिसे पुलिस लूप लाइन मानती है.

लेकिन पिछली भाजपा सरकार में राज्य के गृह मंत्री रहे रामसेवक पैंकरा ने बीबीसी से कहा, "कांग्रेस सरकार निहित स्वार्थ के कारण ऐसे अफ़सरों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रही है, जिससे उसके व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति हो सके."

फ़रवरी 2017 में फ़र्ज़ी मुठभेड़ व आत्मसमर्पण और मानवाधिकार हनन की कई गंभीर शिकायतों के बाद उन्हें बस्तर से हटाया गया था. उनको पुलिस मुख्यालय में तैनात किया गया था लेकिन राज्य की भाजपा सरकार ने उन्हें लंबे समय तक कोई ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी.

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल का कहना है कि जिस अफ़सर को भारतीय जनता पार्टी तक ने सक्रिय ड्यूटी से इसलिए दरकिनार कर दिया था क्योंकि 'स्थापित मानव अधिकार संस्थानों ने इनके कारनामों पर संदेह जताया था.' उसे लेकर सरकार का ऐसा फ़ैसला एक ग़लत सन्देश देता है कि कांग्रेस पार्टी मानवाधिकारों और ख़ास कर अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के प्रति गंभीर नहीं है.

पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉ. लाखन सिंह ने कहा कि कुछ महीने पहले तक वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बस्तर के आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी को ताड़मेटला मुठभेड़ में हत्या और बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार करने की मांग कर रहे थे और आज उन्हीं का ईओडब्ल्यू और एसीबी विभागों के नए आईजी के रूप में स्वागत किया जा रहा है- जबकि ये ऐसे पद हैं जहां सत्यनिष्ठा और ईमानदारी की अत्याधिक आवश्यकता होती है.

डॉ. लाखन सिंह ने कहा कि जिस सलवा-जुडूम को सुप्रीम कोर्ट ने ग़ैर-कानूनी और ग़ैर-संवैधानिक घोषित किया था, शिवराम प्रसाद कल्लूरी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी सलवा जुड़ूम के पक्ष में लगातार खड़े रहे.

डॉ. लाखन सिंह ने कहा, "ऐसे दागी पुलिस अफसरों की नियुक्ति को स्थगित कर, सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश से एक विस्तृत जांच कराके, सरकार उनकी रपट और सिफ़ारिशों के आधार पर उचित कार्रवाई करे. जांच होने तक इन पुलिस अफ़सरों को सक्रिय ड्यूटी से अलग रखा जाए."